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एकलव्य बनाम योग्यता बनाम अन्याय

वैसे तो महाभारत की कहानी आप सभी लोगो ने सुनी होगी. अगर सुनी नहीं होगी तो टेलीविजन पर रामानंद सागर कृत सिरीयल में देखी होगी. महाभारत में एकलव्य इकलौता ऐसा चरित्र है जिसके बारे में मुझे लगता है की इतिहास ने न्याय नहीं किया और यही परंपरा अभी भी जारी है.गुरु द्रोणाचार्य ने गुरुदक्षिणा में उसका अंगूठा लेकर कौन सा इतिहास रचा और श्री कृष्णा ने छल से उसके प्राण ले कर भी कोई न्याय तो नहीं किया. ऐसे महान आदर्शवादी शिष्य और आज्ञाकारी सपूत,दृढ इच्छाशक्ति से भरपूर, योग्यता युक्त विभूति के बारे में ठीक से ना समझा पाना भी उसके साथ काफी बड़ा अन्याय है. संस्कारों की बात करने वाले हमारे समाज के बुद्धिजीवी वर्ग ने उसका धयान नहीं रखा की उसके गुणों की चर्चा की जाए. सभी ने महाभारत को बस एक युद्धकथा ही समझा,शायद इसी वजह से एकलव्य पे कोई खास चर्चा नहीं की. मुझे ये गलत लगा सो खुद को रोक ना सका लिखने से.

एकलव्य को अगर हम समझे तो वो एक वैज्ञानिक स्तर का बुद्धिजीवी व्यक्ति था,जिसने बिना गुरु के साथ होते हुए भी अपने आपको न केवल सर्वोत्तम साबित किया अपितु गुरु शिष्य परम्परा के मान का सर्वोत्तम उदाहरण देते हुए त्याग की भावना की भी उच्चतम मिसाल समस्त विश्व के सामने रखी. अर्जुन ने मछली की आँख पर निशाना लगा के खुद को सिद्ध किया था जो दृष्टिगत लक्ष्य था और ये पक्का है की मछली जिन्दा तो बची नहीं होगी. पर एकलव्य ने तो मात्र आवाज पर ही निशाना लगाकर कुत्ते की जान लिए बिना उसका मुहं बंद कर दिया था क्युकी उसका उद्देश्य भी आवाज बंद करना ही था ना की किसी जीव की जान लेना, वो भी बिना गुरु के सानिध्य के अब आप तय करिये की ज्यादा गहराई का ज्ञान रखने वाला योग्य कौन था दोनों में से, निश्चित तौर पर एकलव्य अर्जुन से बड़ा धनुर्धर था. गुरु द्रोणाचार्य उसकी योग्यता से इतने डर गए की उन्हें अर्जुन को दिए गए अपने वचन की चिंता सताने लगी, और एक उच्च कोटि के गुरु होते हुए भी गुरु कर्तव्य से विमुख होकर उससे गुरुदक्षिणा में उसके दाहिने हाथ का अंगूठा ही ले लिया. क्या हक था उन्हें गुरु कहलाने का भी. ये गुरु दक्षिणा कहाँ थी ये तो उनके अंदर एकलव्य की योग्यता से पैदा हुआ डर था क्युकीं वे समझ गए थे की एकलव्य अर्जून से कई गुणा अधिक योग्य है. निश्चित तौर पे वो इस ब्रह्माण्ड का सर्वोच्च धनुर्धर सिद्ध होता अगर गुरु द्रोण दक्षिणा के नाम पर ये घटिया पाप नहीं करते.

अगर द्रोण जी के ही शिष्यों से एकलव्य की तुलना करें तो भी वही सबसे श्रेष्ठ मिलेगा क्युकी उस जैसे गुण किसी में भी तो नहीं थे. जैसे युधिष्ठिर जी ने जानते हुए भी भाईयों समेत द्रौपदी को सिर्फ इसलिए दांव पे लगाया क्युकी उन्हें लग रहा था की शायद नसीब से अगला दांव उनके पक्ष में आ जाये और उन्हें अपना खोया राज्य वापिस मिल जाए , चाहते तो वे खुद को रोक सकते थे गुरु द्वारा निखारे गए अपने शौर्य पर भरोसा किया होता बजाये किस्मत के अगले दांव पर. अर्जुन की बात करें तो जैसा आप सभी जानते हैं उसने तो युद्ध स्थल कुरुक्षेत्र में अपना आत्मविश्वास ही खो दिया था, बच्चों के तरह रोने लग गए थे और कर्तव्य से विमुख हो गए थे.  याद रहे इसी अर्जुन के लिए गुरु द्रोण ने एकलव्य से उसका अंगूठे के रूप में उसका सारा जीवन ही छीन लिया था गुरुदक्षिणा के नाम पर धोखा किया था. अगर श्री कृष्ण नहीं होते तो शायद वो कभी खुद को संभाल ही नहीं पाते. दुर्योधन,दुशासन और बाकि कौरवों की बुराइयों के बारे में तो सभी जानते ही हैं इतिहास भरा पड़ा है.

महत्तवपूर्ण ये है की उस वक़्त के विदुर, श्री कृष्णा, पितामह भीष्म ,कृपाचार्य जैसे विद्वानों में से किसी ने भी गुरु द्रोण के इस कृत्य की आलोचना करनी भी क्यूँ उचित नहीं समझी क्या उनके पास हृदय नहीं था, या वो संस्कारवान नहीं थे. या फिर उन्हें सद्गुणों की पहचान ही नहीं थी. इनमें से किसी ने भी अगर इसका विरोध किया होता तो शायद एकलव्य को थोडा सा न्याय तो मिल जाता .अगर गुरु द्रोण ने ये कुकृत्य ना किया होता तो आज हमारे देश का इतिहास ही कुछ अलग होता क्युकी सबसे अलग मौलिकता युक्त, युद्ध कला में प्रवीण और हृदय में संवेदना रखने वाला व वचन को स्वार्थ से ऊपर रखने वाला अगर भारत का राजा बन जाता तो इस देश को एक स्वर्णिम इतिहास और संस्कारों की एक अमूल्य धरोहर विरासत में मिल जाती. पर राजनीती ने उसकी बलि ले ली. महाभारत को यूँ तो धरम युद्ध कहा गया है अब ये कौनसा धरम था ये समझ से परे है.

एकलव्य से सबसे बड़ी सीख यही मिलती है की हालात कुछ भी हों आपको भरोसा खुद पे होना चाहिए कायनात भी गुरु द्रोण की तरह झुक जाती है. जी हाँ एकलव्य से अंगूठा लेना गुरु द्रोण की सबसे बड़ी हार थी पाप के लिए तभी झुकता है इंसान जब उसके मन में चोर होता है और यही जीवन की सबसे बड़ी हार होती है जब निज स्वार्थ के लिए सच्चाई हार जाती है, और इंसान बुराई के रास्ते पे चलने लगता है.आपसे यही प्रार्थना है की पढ़िए और समझिये व एकलव्य के गुणों का अपने जीवन में उतार लीजिये, आदर्श बनाइये उसे अपने जीवन का.अगर आप मेरे दृष्टिकोण से सहमत हो तो आपको भी उसके महान गुणों को स्वीकार करना ही होगा. हम अपनी आगे के पीढ़ी को संस्कारों के रूप में अमूल्य धरोहर में एकलव्य देना चाहेंगे या अर्जुन, दुर्योधन.

मुझे तो अपने देश का वर्तमान भी गुरु द्रोण के ही संस्कारों पे ही चलता नजर आता है.हमारी सरकारें जातिगत रिजर्वेशन दे कर आज भी योग्यता के अंगूठो को ही काट रही है. लाखों एकलव्य जो मौलिक योग्यता के धनी हैं व इस देश और दुनियां को एक उच्च भविष्य दे सकते हैं वो बेचारगी की जिन्दगी जी रहें हैं. आज गहराई से समझने की जरूरत हैं रिजर्वेशन बस आर्थिक स्तर पे पिछड़े लोगो को मिले वो भी नगद मदद के रूप में ना शिक्षा में ना नौकरियों में ना और कहीं. वरना ये देश कभी एकलव्य के गुणों के साथ और उसके साथ हुए अन्याय के साथ न्याय नहीं कर पायेगा और आज के लाखों एकलव्य आरक्षण के नाम पर अपने अंगूठे गवां कर बिना अपनी कोई पहचान बनाये बस विलीन ही हो जायेंगे. इस लेख को लिखने के पीछे मेरा उद्धेश्य किसी जाति विशेष पे टिपण्णी करना नहीं है बस क्या सही न्याय हो सकता है इसे दुनियां के सामने रखना है. अगर आप सहमत हैं तो अपनी राय से अवगत कराएँ, सहमत ना हो तो भी अपने विचार बताएं ताकि हम सभी मिलकर भविष्य के लिए एक स्वर्णिम कल बनायें.

सारे जहाँ में मेरा हिंदुस्तान सुहाना है,

हमें मिलकर इसे विश्व गुरु बनाना है.

कभी ना इसका स्तर हमें गिरवाना है,

सबको मिले अवसर यही हमने ठाना है.

जय हिन्द….

©100rb

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